जगा अपने अंतर की ज्वाला। धर रूप काली का विकराला! जगा अपने अंतर की ज्वाला। धर रूप काली का विकराला!
जागा सौरभ, मूर्तमान हो इधर-उधर फिरता अशरीर चमक उठी फिर वनस्पती, कौशिक* का पहने हुए चीर जागा सौरभ, मूर्तमान हो इधर-उधर फिरता अशरीर चमक उठी फिर वनस्पती, कौशिक* का पहन...
सरसों पीली लहलहा रही मानो सारी धरती स्वर्ण हुई स्वर्ग कल्पना साकार हुई जीवन श्वासे सरसों पीली लहलहा रही मानो सारी धरती स्वर्ण हुई स्वर्ग कल्पना साकार हुई ...
हे कविता ! तुम हो शब्द ब्रह्म अर्थों के परम अर्थ जिसका आश्रय पाकर वाणी होती ना व्यर्थ। हे कविता ! तुम हो शब्द ब्रह्म अर्थों के परम अर्थ जिसका आश्रय पाकर वाणी होत...
ऐसे में क्या हमें अभी भी इस मिट्टी की शक्ति का एहसास नहीं है ऐसे में क्या हमें अभी भी इस मिट्टी की शक्ति का एहसास नहीं है
सनातनी संहिताओं को टटोलो राज है इसमें गड़ा हुआ। सनातनी संहिताओं को टटोलो राज है इसमें गड़ा हुआ।